पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण।
जैसा ब्रह्माण्ड है वैसा शरीर भी बताया जाता है — पैरों में पाताल – पैरों के ऊपरी तल में रसातल – दोनों गुल्फ तलातल – घुटनों में सुतल – दोनों ऊरू तथा कटिभाग अतललोक – नाभी को भूलोक – उदर भुवर्लोक – वक्षःस्थल स्वर्गलोक – ग्रीवा को महर्लोक – मुख को जनलोक – दोनों नेत्र तपलोक और मस्तक सत्यलोक कहा गया है —
जैसे पृथ्वी पर सात द्वीप हैं – उसी प्रकार शरीर में सात धातुएँ हैं– त्वचा – रक्त – माँस – मेदा – हड्डी – मज्जा और वीर्य —
शरीर में तीन सौ साठ हड्डियाँ हैं तथा तीस लाख छप्पन हजार नौ सौ नाडियाँ हैं – जैसे नदियाँ पृथ्वी पर बहती हैं उसी प्रकार नाडियाँ शरीर में रस का प्रवाह करती हैं — यह शरीर साढ़े तीन करोड़ स्थूल एवं सूक्ष्म रोएं से आच्छादित है ( इस संख्या में कहीं- कहीं भेद है )
इस शरीर में साढ़े तीन – तीन व्याम पुरूष की आँतें होती हैं – स्त्रियों की आँतें तीन – तीन व्याम की होती हैं –
हृदय में एक कमल बताया जाता है – उसकी नाल तो ऊपर की और मुह नीचे की ओर है – उस ह्रदय के वामभाग में प्लीहा है और दक्षिण भाग में यकृत–शरीर में मज्जा – मेदा – वसा – मूत्र – पित्त – कफ – विष्ठा – रक्त – तथा रस के गड्ढे हैं – इनका माप दो – दो अंजली माना गया है–
वायु, शरीर में वायु – अग्नि तथा चन्द्रमा ये पाँच- पाँच भागों में विभक्त होकर स्थित है—
प्राण – अपान – समान – उदान और व्यान ये वायु के पाँच भेद माने गये हैं —
प्राण — उच्छ्वास ( ऊपर की ओर श्वास खींचना ) – निःश्वास ( श्वास को बाहर निकालना ) अन्न और जल को शरीर के भीतर पहुँचाना ये तीन प्राणवायु के कर्म हैं — कंठ से लेकर मस्तक तक इसका स्थान है —
अपान — मल – मूत्र – तथा वीर्य का त्याग और गर्भ को योनि से बाहर निकालना- यह अपान वायु का कर्म है — इसका स्थान गुदा के ऊपर है — समान — समान वायु खाये हुए अन्न को धारण करती – यह सम्पूर्ण शरीर में रस संचार करती बेरोक – टोक विचरती है —
उदान — वाक्य बोलना – उद्गार ( कंठ के भीतर से कुछ निकालना ) – तथा कर्मों के लिए सब प्रकार से यत्न करना – ये उदान वायु के कार्य हैं – इसका स्थान कंठ से लेकर मुख तक है – व्यान — व्यान वायु सदा ह्रदय में स्थित रहती है – और सम्पूर्ण देह का भरण – पोषण करती है – धातु को बनाना – पीसना – लार आदि को निकालना तथा आँखों को खोलने मीचने की क्रिया- ये सब व्यान वायु के कार्य हैं ।
अग्नि ,पाचक – रञ्जक – साधक – आलोचक तथा भ्राजक – इन पांच रूपों में अग्नि इस शरीर के अंदर स्थित है ,पाचक अग्नि सदा पक्वाशय में स्थित होकर खाये हुए अन्न को पचाती है –रञ्जक अग्नि अमाशय में स्थित होकर अन्न के रस को रंगकर रक्त के रूप में परिणित कर देती है । साधक अग्नि ह्रदय में रहकर बुद्धि और उत्साह आदि को बढाती है ।
आलोचक अग्नि नेत्रों में निवास करके रूप देखने की शक्ति बढाती है ।
भ्राजक अग्नि त्वचा में स्थित हो शरीर को निर्मल एवं कान्तिमान बनाती है—
चन्द्रमा ,क्लेदक – बोधक – तर्पण – श्लेषण तथा आलम्बक – इन पाँच रूपों में चन्द्रमा शरीर के अंदर निवास करता है —
क्लेदक चन्द्रमा पक्वाशय में स्थित होकर प्रतिदिन खाये हुए अन्न को गलाता है -बोधक चन्द्रमा रसनेन्द्रियों में रहकर मधुर आदि रसों का अनुभव कराता है ,तर्पण चन्द्रमा मस्तक में स्थित होकर नेत्र आदि इन्द्रियों की तृप्ति और पुष्टि करता है –
श्लेषण चन्द्रमा सब संधियों में व्याप्त होकर उन्हें परस्पर मिलाये रखता है –आलम्बक चन्द्रमा ह्रदय में स्थित हो शरीर के सब अंगों को परस्पर अवलम्बित रखता है ।
आकाश ,इन्द्रियों के छिद्र – रोमकूप – तथा उदर का अवकाश भाग – शरीर में जो भी अवकाश भाग है वे सब आकाश जनित है। जल ,शरीर में जो भी रस भाव है – जैसे रक्त – मूत्र – कफ – लार – थूक – आदि सब जल का ही भाग है ।
पृथ्वी ,नासिका – केश – नख – हड्डी – धीरता – भारीपन – त्वचा – मांस – ह्रदय – गुदा – नाभि – मेदा – यकृत – मज्जा – आँत – आमाशय – शिरा – स्नायु – तथा पक्वाशय इन सबको पृथ्वी का अंश बताया है – नेत्रों में जो श्वेत भाग है – वह कफ से उत्पन्न होता है – काला भाग वायु से उत्पन्न होता है – श्वेत भाग पिता का काला भाग माता का अंश है, दोनों अंडकोश मेदा – रक्त – कफ और मांस इन चार धातुओं से युक्त बताये गये हैं– सभी प्राणियों की जिव्हा रक्त- मांसमयी है –इस प्रकार इन सात धातुओं से बने हुए पच्चीस तत्व युक्त शरीर में जीवात्मा निवास करता है- पुरुष शरीर में दस इन्द्रिय द्वार होते हैं – स्त्री शरीर में तेरह इन्द्रिय द्वार हैं – त्वचा – रक्त – मांस – ये तीनों माता के अंश से तथा मेदा – मज्जा – अस्थि – ये पिता के अंश से उत्पन्न बताये जाते हैं —
दो कान – दो आँख – दो नाक – जिव्हा – दांत – लिङ्ग – गुदा – नख – और रोमकूप – ये बारह मल के आश्रय हैं- इन बारह मार्गों से छटी हुई मल बाहर निकलती है।
ये सिर्फ एक प्रयास है शरीर को जानने का – इस शरीर में इतनी विचित्रताऐं हैं कि साधारण बुद्धि से इसे नहीं जाना जा सकता – जैसे ब्रह्माण्ड को जानना असम्भव सी बात है – ऐसी ही यह स्थूल और लिङ्ग शरीर ( सूक्ष्म शरीर ) है।
