पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण।
बगहा । विश्व के कोने-कोने में पहुंचने को आतुर, अपनी व्यापकता के कारण नदी तटों को लघुकर्ता व निरंतर नए घाट के निर्माण में प्रयत्नशील बिहार की यशस्वी सरजमी से उदित उदयभान और अस्तांचल सूर्य उपासना एवं लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा* के पावन अवसर पर मैं आप सभी को हार्दिक अभिनंदन करता हूं। प्रणाम करता हूं तथा इस महामंत्र *ऊं घृणि सूर्याय नमः से आप सभी को अभिसिंचित करता हूं*।
वैसे तो सूर्य की पूजा भारत के साथ-साथ यूनान मिस्र आदि कई देशों में भी होती रही है। मिस्र का शासक *अखनाटन ने तो सूर्य को राष्ट्रीय देवता घोषित किया था और सूर्य उपासना पर बल दिया था*। तथापि सूर्य को प्राकृतिक वनस्पतियों द्वारा विधिवत पूजा करने की *जो अनूठी परंपरा बिहार के सरजमी से निकली। उसने तो न केवल बिहार को अपितु भारत के साथ साथ-साथ पुरे विश्व को अपने सरलता व सहजता और दिव्यता एवं अपने अनोखे पन के कारण अपना लेने के लिए उतावला बना दिया है*। जातिगत भेद- भाव व उच्च -नीच की भावनाओं से परे *सभी को एक घाट पर खड़ा कर प्रकाश के इकलौते देवता सूर्यनारायण को पूजने यानी एकेश्वरवाद का परिचायक यह महापर्व महान् आस्था के साथ लोगों के हृदय में निरंतर बसता व बढ़ता जा रहा यह त्योहार विश्व के कोने-कोने तक पहुंचने को आतुर है* । जिससे नदियों का तट सिमटता सा जा रहा है और नदी घाटों की खोज में *लोग पहले पोखर अब अपने आंगन में भी नदी तक बनकर भारत की पवित्र नदियों का आवाहन कर उसमें खड़े होने को मजबूर हो रहे हैं। यानी विशाल आस्था के सामने बहु नदियों वाला इस देश की घाटें छोटी पड़ती जा रही हैं*। यही इसकी विशालता भी है और उदारता भी। क्योंकि इस पर्व को कहीं भी किसी भी अवस्था में मना सकते हैं । *न तो इसमें बहुत मंहगे समानों की आवश्यकता है और किसी विद्वान शास्त्र वेत्ता ब्राह्मण की*। इसमें साधन और साधक दोनों आप ही होते हैं। *रोजमर्रा के दिनों में जिन वस्तुओं का उपयोग होता है। उन वस्तुओं को अपने छिपली में सजा सूर्य की उपासना सहज ही हो जाती है*। चतुर्थ दिवसीय यह त्यौहार सगे- संबंधियों के जुटान का भी एक प्रमुख अवसर है। यह कैसे बीत जाता है ।पता भी नहीं चलता।
*अब हर कोई इस आस्था में नदी में स्नान कर सूर्य की उपासना करना चाहता है*।
*वास्तव में यह सूर्य पवित्र प्रचंड और प्रखर प्रकाश के सुन्दर सोंच का द्योतक है ।जो निरंतर उदय और अस्त होकर हमें नई सोच के साथ अपने कार्यों में लगे रहने की प्रेरणा देता है*। सूर्य उदय का अर्थ है सृजन करना अर्थात वर्तमान का निर्माण करना तथा सूर्य अस्त का सही माने है। जो जन्म लिया है उसका अस्त होना*। इसके दूसरे मायने ऐसे भी समझ सकते हैं कि सूर्योदय निर्माण का प्रतीक है और सूर्यास्त विध्वंस का या यूं कहें कि उत्पत्ति और संहार । *सूरज के उदय -अस्त होना अपने वर्तमान और अपने अतीत को याद करने की सीख है*। क्योंकि अतीत के संस्मरण बिना सुखद वर्तमान का निर्माण संभव नहीं है । *जो अपने अतीत को भूल जाते हैं। वह अपने वर्तमान को सही नहीं बना पाते हैं ।अतीत से सीख लेकर ही वर्तमान को सुदृढ़ किया जा सकता है*। सूर्योदय और सूर्यास्त का सही सीख है। इसलिए हम सभी को चाहिए कि लोक आस्था इस महापर्व पर सूर्य की भांति ही उत्कृष्ट व प्रखर सभी का कल्याण करने वाला प्रकाश रुपी सोच रखना चाहिए।
*सूर्योपासना के इस महान पर्व पर हमसभी लोक कल्याण रुपी सर्वहित सद्भावना, उत्थान ,सुन्दर सहयोग व स्वास्थ्य रुपी ईंख, ठेकुआ, हल्दी ,सेब ,केला, सिंघाड़ा, नारियल, लड्डू बताशा आदि समाग्रियों से अपने प्रखर सोंच रुपी छिपली/दौउरा को सजाकर* सूर्य भगवान को समर्पित करें।
आपका
निप्पू कुमार पाठक
सचिव नैतिक जागरण मंच वेलफेयर ट्रस्ट
मोबाइल नंबर-9934211464
