पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण बिहार।
मधुबनी। शिव का औघड़ रूप परम वैराग्य, सरलता और सांसारिक बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है। औघड़ का अर्थ ऐसे स्वरूप से है, जो लोक दिखावे, भय, घृणा और भेदभाव से पूरी तरह परे हो। सहजता ही अघोर है। जो व्यक्ति भीतर से जितना सरल, शांत और दिखावे से दूर होता है, वह उतना ही शिव के औघड़ रूप के करीब होता है। उक्त बातें पं. भरत उपाध्याय ने कहीं।
उन्होंने कहा कि शिव का औघड़ स्वरूप मनुष्य को यह संदेश देता है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाहरी श्रृंगार नहीं, बल्कि भीतर के अहंकार को भस्म करना आवश्यक है। शिव का औघड़ रूप न विधि देखता है और न विधान। जो भक्त सच्चे मन से उन्हें पुकारता है, शिव उसे अपना सर्वस्व प्रदान कर देते हैं।
पं. उपाध्याय ने कहा कि औघड़ दानी शिव के दरबार में ऊंच-नीच, राजा-रंक और किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है। उनके लिए विष और अमृत दोनों समान हैं। शिव का यही स्वरूप उन्हें करुणा और समभाव का प्रतीक बनाता है।
उन्होंने कहा कि पावन श्मशान में लोग जिसे अशुभ मानकर छोड़ देते हैं, औघड़ शिव उसे भी अपने गले लगा लेते हैं। यही उनकी परम करुणा है। शिव का औघड़ स्वरूप मनुष्य को अहंकार, भेदभाव और बाहरी आडंबर छोड़कर सहज, शांत और करुणामय जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
