धन से नहीं, प्रेम, विश्वास और संवेदनाओं से मजबूत होते हैं रिश्ते, युवाओं को शिक्षा और संस्कार से जुड़ने का संदेश
पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण।
बगहा। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और बढ़ती भौतिकवादी सोच के बीच रिश्तों के मायने भी बदलते नजर आ रहे हैं। जब तक व्यक्ति के पास धन और संसाधन होते हैं, तब तक उसके आसपास मित्रों और शुभचिंतकों की भीड़ रहती है। लेकिन आर्थिक संकट आने पर कई रिश्तों की असलियत सामने आने लगती है। खाली जेब इंसान को नहीं, बल्कि उसके आसपास के लोगों को पहचानने का अवसर देती है। यह बातें बगहा-1 प्रखंड के बेलवा डुमरिया निवासी पत्रकार, समाजसेवी एवं देशभक्त नरेंद्र पांडेय ने अपने जीवन के अनुभवों पर आधारित विचार साझा करते हुए कहीं।
नरेंद्र पांडेय ने कहा कि रिश्तों की असली मजबूती धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और आपसी सहयोग से तय होती है। सुख के समय साथ रहने वाले कई लोग मुश्किल घड़ी में दूरी बना लेते हैं। वहीं, संकट के समय जो लोग बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़े रहते हैं, वही सच्चे मित्र और अपने होते हैं।
उन्होंने कहा कि आज डिजिटल इंडिया के दौर में लोगों की जिंदगी मोबाइल और तकनीक के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में इंसान कई बार अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को भी भूल जाता है। पैसे की अहमियत अपनी जगह है, लेकिन इसके लिए माता-पिता, रिश्तों और मानवीय मूल्यों की अनदेखी करना उचित नहीं है। इंसान इस दुनिया में खाली हाथ आता है और अंतिम समय में भी उसे खाली हाथ ही जाना पड़ता है। ऐसे में धन के पीछे भागते हुए मानवता और संवेदनाओं को खो देना जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
उन्होंने पुरानी सामाजिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले लोग आपसी मेलजोल, सहयोग और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से अपनी प्रतिभा और क्षमताओं को सामने लाते थे। आज भी समाज को उन्हीं संस्कारों और मूल्यों की जरूरत है। यदि लोग बुरे कार्यों से दूर रहकर अपना समय अच्छे कार्यों, समाजसेवा और रचनात्मक गतिविधियों में लगाएं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाज का निर्माण संभव है।
युवाओं को संदेश देते हुए नरेंद्र पांडेय ने कहा कि मोबाइल और डिजिटल दुनिया के आकर्षण से बाहर निकलकर शिक्षा, किताबों और अपने भविष्य पर ध्यान देना जरूरी है। यदि युवा प्रतिदिन आठ घंटे भी पूरी लगन से पढ़ाई करें, तो उनके जीवन में बेहतर अवसरों के रास्ते खुल सकते हैं। अन्यथा भविष्य में उन्हें अधिक मेहनत और संघर्ष करना पड़ सकता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे आधुनिक तकनीक का सदुपयोग करें, पुरानी परंपराओं और संस्कारों को संजोएं तथा शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाएं।
अंत में उन्होंने कहा कि रिश्तों की असली पहचान धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में मिलने वाले सहयोग से होती है। मानवता, निष्ठा और आपसी सम्मान ही ऐसे मूल्य हैं, जो समाज और परिवार को मजबूत बनाते हैं। यही सोच आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य की नींव रख सकती है।
