68 वर्षों से कायम है सांस्कृतिक परंपरा, मैथिली नाट्य कला के जरिए प्रेम, त्याग और निष्ठा का दिया गया संदेश
(मिथिलेश कुमार झा सुपौल)
सुपौल। बीणा बभनगामा स्थित राष्ट्रीय नाट्य परिषद सह राष्ट्रीय पुस्तकालय के प्रांगण में तीन दिवसीय कोजागरा महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। ग्रामीणों के सहयोग से पिछले 68 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा यह महोत्सव मैथिली संस्कृति, सभ्यता और पारंपरिक नाट्य कला का जीवंत प्रतीक बन चुका है। महोत्सव के दूसरे दिन धार्मिक नाटक ‘नल-दमयंती’ का भव्य मंचन किया गया, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। नाटक की प्रभावशाली प्रस्तुति, कलाकारों के अभिनय और भावपूर्ण दृश्यों ने दर्शकों का मन मोह लिया। प्रेम, त्याग और निष्ठा की अनूठी गाथा है ‘नल-दमयंती’ धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं पर आधारित ‘नल-दमयंती’ भारतीय साहित्य की एक प्रसिद्ध प्रेमगाथा है। इसकी कथा महाभारत के वनपर्व में वर्णित नलोपाख्यान से जुड़ी है। निषध देश के राजा नल और विदर्भ की राजकुमारी दमयंती की प्रेमकथा भारतीय परंपरा में प्रेम, समर्पण, विश्वास और दांपत्य निष्ठा के आदर्शों के लिए जानी जाती है। कथा के अनुसार, राजा नल और दमयंती एक-दूसरे के गुणों से परिचित होकर प्रेम करने लगते हैं। दमयंती के स्वयंवर में अनेक राजाओं और देवताओं की उपस्थिति के बावजूद वह राजा नल को अपने जीवनसाथी के रूप में चुनती हैं। विवाह के बाद दोनों का जीवन अनेक कठिनाइयों से गुजरता है। जुए में राज्य गंवाने, वनवास और बिछोह जैसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनके प्रेम और एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना कथा का प्रमुख आधार है। नल-दमयंती की यह गाथा संदेश देती है कि जीवन में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धैर्य, विश्वास, प्रेम और दृढ़ संकल्प के बल पर कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है। कोजागरा महोत्सव में इस पौराणिक प्रसंग का नाट्य रूपांतरण दर्शकों के लिए मनोरंजन के साथ-साथ सांस्कृतिक और नैतिक संदेश का माध्यम बना। पहले दिन ‘हठात परिवर्तन’, तीसरे दिन ‘अरावली का शेर’ का मंचन महोत्सव की शुरुआत पहले दिन मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद रात्रि में मैथिली नाटक ‘हठात परिवर्तन’ का मंचन किया गया। दूसरे दिन धार्मिक नाटक ‘नल-दमयंती’ की प्रस्तुति ने आयोजन में विशेष आकर्षण जोड़ा। वहीं, तीसरे दिन ‘अरावली का शेर’ नाटक का भव्य मंचन किया जाएगा, जिसे लेकर दर्शकों में उत्सुकता बनी हुई है। महोत्सव में गांव के लोगों के साथ-साथ बाहर रहने वाले ग्रामीण भी बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं। अपनी मिट्टी और परंपरा से जुड़ाव के कारण कई लोग इस अवसर पर अपने गांव लौटते हैं और पारंपरिक नाट्य मंचन का आनंद लेते हैं। 68 वर्षों से संस्कृति संरक्षण का प्रयास राष्ट्रीय नाट्य परिषद सह राष्ट्रीय पुस्तकालय के सचिव चंद्रशेखर झा ने बताया कि ग्रामीणों के सहयोग और आपसी एकजुटता के कारण यह परंपरा पिछले 68 वर्षों से निरंतर आगे बढ़ रही है। महोत्सव का मुख्य उद्देश्य मैथिली संस्कृति और सभ्यता को संरक्षित करना तथा नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। उन्होंने क्षेत्र के लोगों से महोत्सव में पहुंचकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाने की अपील की। महोत्सव के सफल आयोजन में समिति के अध्यक्ष बांके बिहारी मिश्र, कोषाध्यक्ष जितेंद्र कुमार झा और सचिव चंद्रशेखर झा सहित सभी सदस्य एवं ग्रामीण सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। समिति के सदस्यों में विभास कुमार झा, राकेश कश्यप, पंकज कुमार झा, आदित्य शेखर, आलोक आनंद, नितेश आजाद, आशीष कुमार झा, आशुतोष कुमार, सचिन कुमार, हेमशंकर चौधरी, जितेंद्र कुमार गुड्डू और हरिशंकर चौधरी शामिल हैं। नाट्य मंचन के निर्देशन की जिम्मेदारी नरेंद्र ठाकुर संभाल रहे हैं। वहीं, उपनिदेशक नवीन कुमार मिश्र के साथ कृष्णानंद योगी और राजेश कुमार भी आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, कोजागरा महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बीणा बभनगामा की पहचान और सामूहिक एकजुटता का प्रतीक है। तीन दिनों तक चलने वाला यह आयोजन मैथिली नाट्य कला को मंच प्रदान करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से परिचित कराने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। दूसरे दिन ‘नल-दमयंती’ के मंचन ने एक बार फिर साबित किया कि पौराणिक कथाएं आज भी प्रेम, विश्वास और मानवीय मूल्यों का संदेश देने में प्रासंगिक हैं।
