26 सितंबर को होगा पूर्णिमा श्राद्ध, मृत्यु तिथि के अनुसार किया जाएगा पितरों का श्राद्ध; घरों में तर्पण व पिंडदान की तैयारियां शुरू
पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण बिहार।
बगहा। पितृपक्ष की शुरुआत इस वर्ष 27 सितंबर से होगी। इससे एक दिन पूर्व 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा, जबकि 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इसे लेकर घरों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
पंडित अंकित उपाध्याय ने बताया कि 27 सितंबर, रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध के साथ पितृपक्ष शुरू होगा। इसके बाद दिवंगत परिजनों का श्राद्ध उनकी मृत्यु की हिंदू तिथि के अनुसार किया जाएगा। क्रमशः 28 सितंबर को द्वितीया, 29 को तृतीया, 30 को चतुर्थी, 1 अक्टूबर को पंचमी, 2 को षष्ठी, 3 को सप्तमी, 4 को अष्टमी, 5 को नवमी, 6 को दशमी, 7 को एकादशी, 8 को द्वादशी, 9 को त्रयोदशी व चतुर्दशी श्राद्ध होगा। वहीं 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी।
मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होने पर अमावस्या को श्राद्ध
पंडित समृद्ध सिद्धेश्वर पाण्डेय ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार दिवंगत परिजन की मृत्यु की तिथि ज्ञात होने पर उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। वहीं, मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होने पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। अमावस्या तिथि को निधन हुए लोगों का श्राद्ध भी इसी दिन किया जाता है।
तर्पण में जल, तिल और कुश का महत्व
उन्होंने बताया कि तर्पण के दौरान जल, काले तिल और कुश का प्रयोग करने की परंपरा है। पितरों का नाम और गोत्र लेकर उनका स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार तर्पण और श्राद्ध की विधि में कुछ अंतर हो सकता है।
अपराह्न काल में श्राद्ध का विधान
पंडित पाण्डेय ने बताया कि श्राद्ध कर्म के लिए दिन का अपराह्न काल महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय सूर्योदय और पंचांग के अनुसार श्राद्ध का समय अलग-अलग हो सकता है। इसलिए श्राद्ध कर्म के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय निर्धारित करना उचित माना जाता है।
श्राद्ध के दिन स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने, पितरों का स्मरण कर संकल्प लेने तथा परंपरा के अनुसार तर्पण और पिंडदान करने का विधान बताया गया है। कई परिवारों में भोजन, दक्षिणा तथा गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी निभाई जाती है।
पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस दौरान लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण और श्राद्ध से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
