पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण बिहार।
बगहा। सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति असीम कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर माना गया है। पं. भरत उपाध्याय के अनुसार वर्ष 2026 में पितृपक्ष का आरंभ 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा एवं आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से होगा और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। पितृपक्ष के प्रथम दिन से ही तर्पण की प्रक्रिया शुरू होगी तथा महर्षि अगस्त्य को भी जलांजलि अर्पित की जाएगी।
उन्होंने बताया कि पितृकर्म की परंपरा में महर्षि अगस्त्य को तर्पण देने का विशेष धार्मिक महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले महर्षि अगस्त्य ने अपने पितरों को तर्पण के अभाव में अधोमुख लटककर कष्ट भोगते देखा था। इसके बाद उन्होंने विवाह कर वंशवृद्धि तथा पितृकर्म के महत्व को लोक में स्थापित किया। इसी मान्यता के आधार पर मुख्य पितृ तर्पण से पूर्व देव-ऋषि तर्पण के अंतर्गत महर्षि अगस्त्य को जल अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
‘भुआ का पानी’ देने की भी विशेष परंपरा
पं. उपाध्याय के अनुसार पितृपक्ष में कुल की कन्या यानी पिता की बहन (भुआ) के निमित्त भी जलांजलि देने की परंपरा भारतीय परिवार व्यवस्था की संवेदनशील और समावेशी भावना को दर्शाती है। यदि भुआ के निधन की निश्चित तिथि ज्ञात हो तो उसी तिथि को उनके निमित्त जल दिया जाता है। तिथि की जानकारी नहीं होने पर मातृ नवमी, 4 अक्टूबर अथवा सर्वपितृ अमावस्या, 10 अक्टूबर को ‘भुआ का पानी’ देने का विधान बताया गया है।
उन्होंने कहा कि विवाह के बाद पुत्री दूसरे गोत्र और परिवार में चली जाती है, लेकिन अपने मायके के कुल से उसका संबंध और सम्मान समाप्त नहीं होता। इसी भावना के तहत यह परंपरा सुनिश्चित करती है कि कुल की बेटी को उसके मूल परिवार के वंशज भी स्मरण करें और जलांजलि अर्पित करें। यह परंपरा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि परिवार, पूर्वजों और मातृशक्ति के प्रति कृतज्ञता एवं सम्मान का भाव भी प्रकट करती है।
पं. भरत उपाध्याय ने कहा कि पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों, पूर्वजों और पारिवारिक संस्कारों को स्मरण करने का अवसर देता है। तर्पण के माध्यम से श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपने संस्कारों और पारिवारिक परंपराओं से जोड़ने का संदेश भी देता है।
