पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण बिहार।
मधुबनी/बगहा। जीवन की नश्वरता और उसके अंतिम सत्य को समझने के लिए इतिहास और धर्मग्रंथों से बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। रामायण के अंत में माता सीता धरती में समा गईं और भगवान श्रीराम ने जल समाधि ली। महाभारत का भी अंत भगवान श्रीकृष्ण के निधन और पांडवों की मृत्यु के साथ हुआ। इससे स्पष्ट है कि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है और संसार अपनी गति से चलता रहता है।
पं. भरत उपाध्याय कहते हैं कि मनुष्य चाहे कितना भी सुंदर और सामर्थ्यवान क्यों न हो, समय के साथ शरीर ढल जाता है। कंचन जैसी काया पर झुर्रियां पड़ जाती हैं और एक समय ऐसा आता है जब अपना शरीर भी पूरी तरह साथ नहीं देता। ऐसे में किसी दूसरे के हमेशा साथ रहने की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को सात पीढ़ियों के लिए धन-संपत्ति जोड़ने की चिंता छोड़कर इतना ही कमाना चाहिए कि जीवन सम्मान के साथ चल सके और किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता न पड़े। जब जीवन मिला है तो उसे केवल संग्रह करने में नहीं, बल्कि अपने शौक पूरे करने, परिवार के साथ समय बिताने और अच्छे कर्म करने में लगाना चाहिए। उम्र लगातार भाग रही है और अंततः इकट्ठा किया हुआ धन-संपत्ति यहीं रह जाएगा।
‘एसएमएस’ से समझाया भगवान को पाने का मार्ग
पं. उपाध्याय ने भगवान के स्मरण को लेकर एक रोचक प्रसंग भी सुनाया। एक भक्त ने संत से पूछा कि उसे भगवान नहीं मिले, भगवान को पाने का मार्ग क्या है? संत ने कहा कि भगवान तो सर्वव्यापी हैं, हर जगह मौजूद हैं, लेकिन तुमने शायद उन्हें एसएमएस नहीं किया होगा।
भक्त ने पूछा कि भगवान का नंबर तो है ही नहीं, फिर एसएमएस कैसे करूं? इस पर संत ने समझाया कि पहले एसएमएस का अर्थ समझो—एस यानी सच्चे, एम यानी मन से और एस यानी स्मरण। अर्थात भगवान का सच्चे मन से स्मरण करो, ईश्वर की अनुभूति के लिए किसी बाहरी माध्यम की आवश्यकता नहीं है।
पं. भरत उपाध्याय का संदेश यही है कि जीवन क्षणभंगुर है। धन-दौलत और शरीर सब यहीं छूट जाना है। इसलिए जीवन को सार्थक बनाइए, जरूरत भर कमाइए, अपने सपने पूरे कीजिए और सबसे बढ़कर सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण कीजिए।
