पंचानन सिंह बगहा पश्चिमी चंपारण बिहार।
बगहा/मधुबनी।जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आम बोलचाल में जिउतिया या जितिया व्रत कहा जाता है, सनातन धर्म में संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है। इस अवसर पर माताएं अपने पुत्र-पुत्रियों की सलामती और दीर्घायु की कामना को लेकर कठिन निर्जला उपवास करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत श्रद्धा, संयम और निष्ठा के साथ करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं। पूर्व प्राचार्य हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज मधुबनी पं. भरत उपाध्याय के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की उदया अष्टमी तिथि को किया जाता है। व्रत की शुरुआत एक दिन पहले नहाय-खाय से होती है। इस दिन स्नान के बाद मातृ पूर्वजों को झिंगुनी के पत्ते पर खरी तेल अर्पित कर पूजा की जाती है। इसके बाद व्रती पवित्र भोजन ग्रहण करती हैं। रात्रि में लगभग 3 से 4 बजे से पहले दही-चूड़ा, चीनी, फल, दूध और मिठाई आदि ग्रहण करने की परंपरा बताई गई है।
खर जितिया में रखा जाता है निर्जला व्रत
अष्टमी तिथि के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। इस दौरान अन्न-जल ग्रहण करना वर्जित माना जाता है। व्रती पूरे दिन पूजा-अर्चना करने के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा का श्रवण करती हैं। हालांकि रोगी, गर्भवती और वृद्ध महिलाएं अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार दिन में उपवास रखकर रात्रि में फलाहार कर सकती हैं।
पारण की भी विशेष धार्मिक परंपरा
पं. उपाध्याय ने बताया कि व्रत के अगले दिन भोर में पारण की परंपरा है। व्रती अपनी सास की मांग भरने तथा उन्हें अन्न आदि दान करने की परंपरा निभाती हैं। जिनकी सास का निधन हो चुका है, वे पूजा स्थल पर प्रतीकात्मक रूप से यह विधि करती हैं। इसके बाद जल ग्रहण कर सूर्योदय के पश्चात विधिपूर्वक व्रत का पारण किया जाता है।
चील और लोमड़ी की कथा देती है व्रत में श्रद्धा का संदेश
लोक मान्यता के अनुसार एक बार चील और लोमड़ी ने मनुष्यों को जीवित्पुत्रिका व्रत करते और इसकी कथा सुनते देखा। दोनों ने भी व्रत करने का संकल्प लिया। चील ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ व्रत किया, जबकि लोमड़ी भूख सहन नहीं कर सकी और चोरी से मांस खा लिया। मान्यता है कि व्रत के प्रभाव से चील की संतान सुरक्षित रही, जबकि लोमड़ी की संतान जीवित नहीं रह सकी। यह कथा व्रत में श्रद्धा, संयम और नियम के पालन का संदेश देती है।
महाभारत काल से भी जुड़ी है जीवित्पुत्रिका की कथा
दूसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी मानी जाती है। युद्ध के बाद अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में सो रहे द्रौपदी के पांच पुत्रों की हत्या कर दी। बाद में उसने उत्तरा की गर्भस्थ संतान को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। धार्मिक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुण्य के प्रभाव से उत्तरा की गर्भस्थ संतान को पुनर्जीवित किया। जन्म के बाद वही बालक राजा परीक्षित कहलाया। इसी प्रसंग को जीवित्पुत्रिका व्रत की महत्ता से जोड़ा जाता है।
सूर्य उपासना और पुत्रजीवी व्रत की भी मान्यता
एक अन्य कथा में द्वारका के एक ब्राह्मण के सात पुत्रों की अल्पायु में मृत्यु होने का वर्णन मिलता है। दुखी ब्राह्मण ने भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछा। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने उसे सूर्य नारायण की उपासना से जुड़े पुत्रजीवी व्रत का विधान बताया। ब्राह्मण ने श्रद्धापूर्वक व्रत और सूर्य आराधना की। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य की कृपा और श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से उसके पुत्र की आयु बढ़ी।
पं. भरत उपाध्याय ने बताया कि जीवित्पुत्रिका व्रत भगवान श्रीकृष्ण, भगवान सूर्य और राजा जीमूतवाहन की आराधना से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का पर्व है। माताएं इस व्रत के माध्यम से अपनी संतान के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना करती हैं।
